सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

नन्‍हीं परी का घोड़ा ...


कभी पैरों में मेरे

अपने नन्‍हें पांव

रखकर

मेरे हांथ पकड़ती

फिर झूलने की मुद्रा में

लटक जाती

उसे अपने पैरों पे खड़े कर

झुलाते हुऐ देखता

उसका भोला चेहरा

उसकी मासूम मुस्‍कान

से ज्‍यादा चमकती

उसकी आंखे

कभी लटक जाती

गले में

अपनी नन्‍हीं बाहें डालकर

जो मुश्किल से

पहुंचती थी मुझ तक

मैं हंसते हुये

संभालता जब

तो कहती

पापा घोड़ा बन जाओ न

मैं धरती पे टेककर घुटने अपने

बन जाता

नन्‍हीं परी का घोड़ा ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. कभी लटक जाती

    गले में

    अपनी नन्‍हीं बाहें डालकर

    जो मुश्किल से

    पहुंचती थी मुझ तक

    मैं हंसते हुये

    संभालता जब

    तो कहती

    पापा घोड़ा बन जाओ न

    मैं धरती पे टेककर घुटने अपने

    बन जाता

    नन्‍हीं परी का घोड़ा ।



    dil ko chhoo gayi yeh kavita...... aur bachpan bhi yaad aa gaya.....

    bahut hi behtareen prastuti........

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद नन्ही सी प्यारी सी कविता सुन्दर
    regards

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो मुश्किल से

    पहुंचती थी मुझ तक

    मैं हंसते हुये

    संभालता जब

    तो कहती

    पापा घोड़ा बन जाओ न

    मैं धरती पे टेककर घुटने अपने

    बन जाता

    नन्‍हीं परी का घोड़ा ।

    एक बेहद मासूम भाव से भरी रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर और हर पापा को घोडा बनना ही पडता है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. नन्ही परी के उडान के लिये घोडा बनना ही पडता है
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  8. नन्हीं परी तो शानदार है ही, उसका घोड़ा भी जानदार दिखता है।

    उत्तर देंहटाएं