बुधवार, 11 नवंबर 2009

बेटी हैं ...


लड़की हूं मैं,

मेरे सपनों का शीश महल, कभी उसका कोई शीशा टूटता तो कभी कोई चकनाचूर हो जाता, पर मैं किसी से शिकायत नहीं कर सकती थी, भाई पढ़ने जाते तो मैं खुशी-खुशी उनका हर काम करती, आते तो उनके लिये खाना लगाती, देर हो जाती तो वह मेरी चोटी खींच लेते, खुद अपना सामान इधर-उधर फैलाते, और जब नहीं मिलता तो मुझे डांट लगाते, क्‍या मेरा लड़की होना अपराध है ? सोचती हूं मैं भी पढ़ने जाऊं पर बापू ने मेरा नाम नहीं लिखाया, दादी कहती इसे तो घर का कामकाज सिखाओ, दूसरे घर जाना जाना है, यह दूसरे घर बेटियां क्‍यों जाती हैं ? उन्‍हें दूसरे घर जाना होता है क्‍या इसलिये उन्‍हें पढ़ाया नहीं जाता या फिर वह पढ़ने जायेंगी तो घर का काम कौन करेगा, मुन्‍ना को कौन खिलाएगा ?

मां के साथ

हर काम में उनका

हांथ बटाती

छोटे भाई को

अपनी गोद में उठाये-उठाये

कभी मेरी कमर

दर्द से दुहरी हो जाती

पर वह रोये न इसलिये

मैं उसे नीचे नहीं उतारती

वह रोएगा

तो सब मुझको डांटेंगे

मैं लड़की हूं न

सोचती भी हूं,

समझती भी हूं

किससे कहूं

जो अपने गांव में डाक्‍टर हैं

वह भी तो लड़की हैं किसी की

जो पढ़ाती हैं स्‍कूल में

वह भी तो बेटी हैं किसी की

उनके मां-बापू कितने अच्‍छे हैं

जो उन्‍होंने उन्‍हें पढ़ाया ।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा व मार्मिक रचना ।

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  2. समाज में लड़कियों की इस स्थिति को सुधारने की
    जरूरत है

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  3. MAARMIK LIKHA HAI .... AAJ KE AADUNIK DOUR MEIN BHI LADKIYON KE SAATH ATYACHAAR HOTE HAIN .... YE SHARM KI BAAT HAI ....
    ACHHA SANDESH CHIPA HAI IS RSCHNA MEIN .......

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  4. बहुत सुन्दर रचना है बधाई इस सुन्दर संदेश के लिये

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  5. बेटी का दर्द बेटी को देखकर बेटी ने जाना मगर बेटी से बयां नहीं किया गया ...
    बहुत सारी बेटियों की दास्तान छुपी है इस एक कविता में ...!!

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  6. बेटियों का दर्द कहती एक बेहतरीन रचना

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  7. बेटी के बहाने समाज में उनकी स्थिति को सटीक अभिव्यक्ति प्रदान की।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  8. बेटी से बढ़कर क्या होता है ..मेरी भी एक ही बेटी है ..कोपल

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  10. कभी मेरी कमर
    दर्द से दुहरी हो जाती
    पर वह रोये न इसलिये
    मैं उसे नीचे नहीं उतारती
    वह रोएगा
    तो सब मुझको डांटेंगे
    मैं लड़की हूं न
    --

    आपकी इस मार्मिक रचना पढ़ कर, बचपन में स्कूल में पढ़ी गयी प. श्री रामदरश मिश्र जी की कहानी "लड़की" याद आ गयी. दुःख होता है आज भी ऐसी तस्वीर नजर आती है.

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  11. बहुत सारी बेटियों की दास्तान छुपी है इस एक कविता में ...!

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