शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

माँ का साया .... (5)


















इस पन्‍ने पर .... आकर मैं एक बारी ठहर गई
उसकी खिलखिलाहट यूँ तो हर पन्‍ने पर झाँकती थी, उसकी मासूमियत घूम फिर के बार - बार माँ को पुकारती, उसकी आवाज हमेशा बेचैन ही रहती जाने क्‍यूँ, ऐसा लगता जाने कब से बिछड़ी वो माये से, हाँ कभी - कभी जब माँ व्‍यस्‍त होती थी काम में तो वह आवाज लगाती ठोड़ी को घुटनों पर रखकर आँख बंद कर पुकारती माये आओ न, कभी तो उसका पुकारना जायज होता, कभी - कभी वो बेवजह भी आवाज लगाती, कभी कहती मुझे भूख लगी है तो कभी कहती माँ इसका मतलब क्‍या होता है ....  उसकी हर बात का जवाब लिये माँ हाजिर हो जातीं।
यहाँ कहती है वो - माँ से किसी ने एक दिन पूछ ही लिया ये आपकी बेटी, माँ ने भी उसी सहजता से कहा - हाँ ये मेरी बेटी है, सच है कि मैने इसे जनम नहीं दिया, पर संस्‍कारों की धूप और स्‍नेह की छाँव इसे दोनो मेरे आँचल में मिलती है ये मेरे पास रहे या दूर एक आहट हम दोनों के बीच रहती है, जहाँ खामोशी भी बात करती है हमारे बीच तो वहीं इसका बार-बार आवाज देना मुझे दर्शाता है इसके भय को इसने छोटी सी उम्र मे पाया कम खोया ज्‍यादा है, मैं इसे कैसे मिली, कहाँ मिली ये बात मायने नहीं रखती, मायने रखता है हम दोनों का मिलना, फिर मात्र सम्‍बोधन ही नहीं दिल से उस रिश्‍ते में बँधना, इसने जो इतना कुछ खो दिया है तो यह मन ही मन डरती है मुझे भी खोने से, इसका डर इसे खामोश बैठने नहीं देता, ये उसी डर से मुझसे और जुड़ती चली जाती है, बहानों से मुझे पुकारती है मैं समझती भी हूँ .... इसकी हर आवाज पर मैं पलट कर हाँ भी कहती हूँ ... कई बार चुप रहने को कहती हूँ तो कई दफ़ा डाँट भी लगाती हूँ ... फिर कई बार इसके आवाज देने पर मैं जानबूझ कर अनसुना कर देती हूँ, चाहती हूँ ये मेरे बिना भी जीना सीखे, मैं साये की तरह साथ हूँ इसके पर इसे खुद पर आश्रित नहीं करना चाहती... वो स्‍तब्‍ध थी माँ की सोच पर इतनी बड़ी-बड़ी बातों के बीच कहाँ है वह और क्‍या है उसका अस्तित्‍व वह यह सोचते हुए वहीं ठहर गई थी, तभी उसने देखा कि माँ ने उसे देख लिया है छिपते हुए ... माँ की आवाज कानों में पड़ते ही वह माँ के सामने थी ...
यह उसकी सोच थी ... उसकी माँ क्‍या सोचती हैं उसके बारे में पढ़ेंगे हम अगले पन्‍नों पर ... 

16 टिप्‍पणियां:

  1. दीदी सिर्फ एक ही शब्द कहूँगा निःशब्द कुछ भी कहने को बाकी नहीं. दिल से भर भर के बधाई स्वीकारें बस इस सुन्दर प्रस्तुति पर.

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  2. ऐसे रिश्ते चुपके से बन जाते है
    फिर जन्मो-जन्मो साथ निभाते है ...

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  3. माँ... आत्मा से निकला छोटा सा शब्द ब्रह्माण्ड से भी बड़ा है...

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  4. माँ की महिमा को समझना .... बहुत सुंदर

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  5. मैं इसे कैसे मिली, कहाँ मिली ये बात मायने नहीं रखती, मायने रखता है हम दोनों का मिलना, फिर मात्र सम्‍बोधन ही नहीं दिल से उस रिश्‍ते में बँधना,

    एक माँ ही समझ सकती है बेटी के मन की बात .... और रिश्ता वही जो मन से जुड़ा हुआ हो ... बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  6. ये रिश्ते भी न बड़े अजीब से होते हैं ,दिखाई देते हुए भी अनदिखे से .....

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  7. माँ तो ममता देवी होती होती है इसके आगे शब्द नही,बेहतरीन प्रस्तुति.

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 9/4/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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  9. मां यशोदा रहती हैं--स्त्री के ह्रूदय में,प्रकृति ने उसे ही चुना है
    इस दायत्व के लिये.

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