गुरुवार, 23 सितंबर 2010

फिर से जी लूंगी ......


मन ही मन मैं,

तेरा नाप लेकर,

बनाती रही तेरे,

तन के कपड़े

नहीं ये छोटा होगा,

नहीं ये होगा बड़ा,

करती खुद से जाने

कितने झगड़े

तन के कपड़े . . . ।

तू गोरी होगी,

या सांवरी

मैं भी बावरी बन

सजाती रही गुडि़या पे

तेरे वो कपड़े

तन के कपड़े . . . ।

झलक तेरी आंखों में

लेकर सोती तो,

ख्‍वाबों में फिरती

तुझको पकड़े-पकड़े

तन के कपड़े . . . ।

मैं अपना बचपन

फिर से जी लूंगी

तू आ जाएगी तो

मिट जाएंगे सारे झगड़े

तन के कपड़े . . .।

14 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

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  2. गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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  3. सही बात है बच्चों मे फिर से अपना बचपन ढूँढती माँ को पता ही नही चलता कब बडी हो जाती है। सुन्दर रचना। बधाई।

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  4. अंतर्द्वंद से घिरी सुन्दर रचना !

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  5. वात्सल्य रस से भीगी होने वाली मां इन्ही भावों में डूबी रहती है ...
    बेटी की मां होने का एहसास हम स्त्रियों के लिए बहुत खास होता है ...
    उनके होने से पहले से ही ...
    बहुत प्यारी रचना ...
    कुछ ऐसा ही लिखा मैंने भी अपनी कविता " मैं पूर्ण हुई " में ..!

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  6. बहुत खूब...
    प्यारा एहसास :), इसे आपने शब्दों में बहुत खूबसूरती से पिरोया है.

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  7. ममता के कई रूपों में एक अद्भुत रूप यह भी...वाह, बहुत खूब, बहुत प्यारी रचना।

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  8. आपकी रचना में बयां किये अहसास हर माँ महसूस कर सकती है.....बहुत ही सुंदर

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