गुरुवार, 28 जनवरी 2010

कठोरता का आवरण .....





तेरी गोद ने

ममता और दुलार के साथ ही

मां मुझे सिखलाया है

कठिनाईयों से लड़ना,

हालात कितने भी बुरे हों

उनसे लड़कर उबरना

जाने कितने ऐसे पल दिये

मुझको

जिनसे संवारती हूं

मैं अपनों की खुशियां

साकार होते देखती हूं मैं

तेरी दी हुई शिक्षा ने

दिया है एक विशाल हृदय

समेटने को दर्द, आंसू,

सहेजने को विश्‍वास

लुटाने को ममता, दया

कठोरता का आवरण ओढ़कर भी

भीतर से

बिल्‍कुल फूलों सी

कोमल ही हूं .....।

7 टिप्‍पणियां:

  1. मैं क्या बोलूँ अब....अपने निःशब्द कर दिया है..... बहुत ही सुंदर कविता.......


    Regards........

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  2. तेरी दी हुई शिक्षा ने

    दिया है एक विशाल हृदय

    समेटने को दर्द, आंसू,

    सहेजने को विश्‍वास

    लुटाने को ममता, दया

    कठोरता का आवरण ओढ़कर भी

    भीतर से

    बिल्‍कुल फूलों सी

    कोमल ही हूं .....।

    सुंदर कविता !

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  3. मां ही पहली शिक्षक होती है । अच्छी रचना ,बधाई

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  4. बहुत सुन्दर. बहुत कोमल. बहुत सशक्त.

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  5. कठोरता का आवरण ओढ़कर भी

    भीतर से

    बिल्‍कुल फूलों सी

    कोमल ही हूं ..
    वाह बहुत ही सुन्दर. बधाई.

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  6. मेले घल आई एक नन्हीं पली ......मुझे बहुत अच्छी लगी...
    मई इसे लोज सुनती हूँ ......Thank you didi...

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  7. मुझे यह रचना बहुत अच्छी लगी.... मन को छू गई.....

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