गुरुवार, 17 जनवरी 2013

तुम ये तर्पण करना !!!

माँ ... मैं एक कोशिश बनी
हार के क्षणों को अपनी विजय में
परिवर्तित करने के लिए
पर तुम्‍हारे मन का संताप बन गई
....
मैं एक कोशिश बनी
पापा का मस्‍तक ऊँचा कर जाऊँ
नहीं कर सकी ऐसा
और ताउम्र की घुटन बन गई
...
मैं हर क्षण लड़ी
भइया के काँधे पर चढ़ विदा होने के लिए
रक्षा का वचन लेते - लेते
मैं उनकी आँख के कोरों का आँसू बन
मन का संत्रास बन गई
....
मैं बनना चाहती थी अपनी
अपनी बहनों के लिये आदर्श
सखियों की नज़र का अभिमान
बहुत अन्‍याय किया मैने
हर एक के साथ और हिचकी बन
उनके गले का मौन बन अवरूद्ध हो गई
जीवन पर्यन्‍त के लिए
....
तुम जब भी करो मेरी मुक्ति के लिए
शांति का पाठ  तो उन पलों में
एक दुआ करना
किसी भी जनम में बिटिया न बनूँ
ये कहते हुये मन से बस मन से
तुम ये तर्पण करना !!!

26 टिप्‍पणियां:

  1. एक नारी … साहस की प्रतिमूर्ति थी जो
    पर क्या ईश्वर से इसी साहस से कह पाओगी तुम,
    " अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो "...


    marmik

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  2. अब बेटों के लिए नहीं बस बेटियों के होने की दुआ मांगनी चाहिए । बहुत मार्मिक प्रस्तुति ।

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  3. ... गहरे अंतर्मन तक जाती है इस कविता की आखिरी पंक्तिया
    बहुत ही अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  4. बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने सदा दी !

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  5. आह ...क्या सोचने पर मजबूर कर दिया हमने बेटियों को?

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  6. बहुत ही मार्मिक ! हमारा दुर्भाग्य इससे अधिक क्या होगा कि हम अपने घर आँगन को गुलज़ार रखने के लिए बेटियों का वरदान तो माँगते हैं लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाते ! विचलित कर गयी आपकी रचना ! बहुत सुन्दर एवं प्रभावशाली !

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  7. मार्मिक रचना...
    मन को भिगो गयी....
    सस्नेह
    अनु

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  8. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 19/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  9. किसी भी जनम में बिटिया न बनूँ
    ये कहते हुये मन से बस मन से
    तुम ये तर्पण करना !!!
    :'(

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  10. बहुत सुन्दर, मार्मिक प्रस्तुति!

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  11. sochne par mazboor kar diya apki Rachna ne...Sada, sis...

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  12. बेहद मार्मिक भाव , ह्रदय के जज़्बात पिरो दिए गए !!!

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  13. अंतस को छूती बहुत मार्मिक प्रस्तुति...

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  14. बहुत मार्मिक प्रस्तुति ।मन को छू गई..

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  15. सदा दीदी
    आपने सही ही लिखा है
    पता नहीं क्यूँ मानने को जी चाहता है

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  16. नहीं...हर जन्म में बेटी ही की मांग करूंगी ...यह ढृढ़ निश्चय है मेरा ...बहुत ही मर्मस्पर्शी ...!!!!

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  17. सोचने पर मजबूर कर रही है रचना, क्या सचमुच दोष बेटियों का ही है? कैसे मिले इन्हें मुक्ति... बेहद मार्मिक और गंभीर चिंतन

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  18. तुम जब भी करो मेरी मुक्ति के लिए
    शांति का पाठ तो उन पलों में
    एक दुआ करना
    किसी भी जनम में बिटिया न बनूँ
    ये कहते हुये मन से बस मन से
    तुम ये तर्पण करना !!!
    बहुत ही मर्मस्पर्शी ......
    New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
    New post: कुछ पता नहीं !!!

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  19. संवेदनशील प्रस्तुति

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  20. बेटी के मन की पीड़ा को शब्दों का चोला मिल गया ...बहुत खूब

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  21. kshamaa kariye behad nkaaratmak hai ...
    laadli se essi ummid nahi thi...
    desh ki ladliyon urzaa ko niraasha ka aavaran
    mat odhaao varan yakshay prashn ka saahas se
    saamnaa kar jag laadli kahlaao ....
    SHUBHKAMNAAEIN .....

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  22. बहुत ही सुंदर और मन को छूने वाली प्रस्तुति

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  23. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

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  24. हालात कितने भी बिगड़ जाएँ मैं तो बिटिया की ही कामना करूंगी ......

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