तारो की पोटली,
खुलकर गिरी कही..
जब मिली तो एक तारा कम था,
मद्धम रोशनी में,
ज़मीन पर देखा
तो एक नन्ही मुस्कुराहट
उंगली थाम के चली
आई आँगन में..
खिलखिलाती रहती है
अब गालो पे हमारे..
और मुड़ कर देखती है पीछे...
जब भी प्यार से
कोई कहता है... लवी...
हमारी बिटिया लविज़ा के लिए हमारे अज़ीज़ दोस्त कुश ने
एक नज़्म लिखी थी. जिसके प्रस्तुतकर्ता हैं सैय्यद अकबर