गुरुवार, 17 जनवरी 2013

तुम ये तर्पण करना !!!

माँ ... मैं एक कोशिश बनी
हार के क्षणों को अपनी विजय में
परिवर्तित करने के लिए
पर तुम्‍हारे मन का संताप बन गई
....
मैं एक कोशिश बनी
पापा का मस्‍तक ऊँचा कर जाऊँ
नहीं कर सकी ऐसा
और ताउम्र की घुटन बन गई
...
मैं हर क्षण लड़ी
भइया के काँधे पर चढ़ विदा होने के लिए
रक्षा का वचन लेते - लेते
मैं उनकी आँख के कोरों का आँसू बन
मन का संत्रास बन गई
....
मैं बनना चाहती थी अपनी
अपनी बहनों के लिये आदर्श
सखियों की नज़र का अभिमान
बहुत अन्‍याय किया मैने
हर एक के साथ और हिचकी बन
उनके गले का मौन बन अवरूद्ध हो गई
जीवन पर्यन्‍त के लिए
....
तुम जब भी करो मेरी मुक्ति के लिए
शांति का पाठ  तो उन पलों में
एक दुआ करना
किसी भी जनम में बिटिया न बनूँ
ये कहते हुये मन से बस मन से
तुम ये तर्पण करना !!!

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

तुम्‍हारे बारे में ...!!!

मां सोचती हूँ कई बार
तुम्‍हारा प्‍यार  और तुम्‍हारे बारे में
जब भी तो बस यही ख्‍याल आता है
क्‍या कभी शब्‍दों में व्‍यक्‍त हो सकता है
तुम्‍हारा प्‍यार  तुम्‍हारा समर्पण,
तुम्‍हारी ममता
तुम्‍हारा निस्‍वार्थ भाव से किया गया
हर बच्‍चे से समानता का स्‍नेह
.......
मां तुम्‍हारा उदाहरण जब भी दिया
देव मुस्‍कराये पवन शांत भाव से बहने लगी
नदिया की कलकल का स्‍वर मधुर लगने लगा
हर शय छोटी प्रतीत होती है उस वक्‍त
जब भी बाँहें फैलाकर जरा-सा तुम मुस्करा देती हो 
सोचती हूँ जब भी कई बार
तुम्‍हारा प्‍यार  और तुम्‍हारे बारे में
.....
खुशियों का अर्थ मेरे लिये
तुम्‍हारी मुस्‍कान होती है मां
तुम्‍हें पता है तुम्‍हारी उदासी
मेरी हँसी छीन लेती है
तुम्‍हारे आंसू
झंझोड़ देते हैं मेरा अन्‍तर्मन
बेबस हो जाती हूँ उन लम्‍हों में
जिनमें तुम्‍हारे विश्‍वास का
खून होता है
सोचती हूँ जब भी कई बार
तुम्‍हारा प्‍यार  और तुम्‍हारे बारे में !!

बुधवार, 18 जुलाई 2012

ना मेरी ना तुम्‍हारी !!!














माँ 
ये शब्‍द जब भी सुनती हूँ
कहीं पढ़ती हूँ
एक ख्‍याल बन तुम
उतर जाती हो सीधे मन में
कभी गुनगुनाती हो
कोई मीठी धुन
कभी कोई सुगंध बन
महका जाती हो चितवन
तुम्‍हारा ख्‍याल
हर ख्‍याल से प्‍यारा लगता है
उसमें होती है
एक स्‍नेह भरी मुस्‍कान
तुम्‍हारी आहट बिन
मन में अकुलाहट सी होती है
क्‍यूँ ... भला
मैं तो हमेशा तुम्‍हारे पास होती हूँ
कहती हो तुम हमेशा
मेरे सिर पर
एक हल्‍की सी चपत लगा के
पर क्‍या करूं माँ
तुम याद आती हो तो फिर आती हो
फिर तुम्‍हारा ख्‍याल सब पर
भारी हो जाता है
किसी की नहीं सुनता
ना मेरी ना तुम्‍हारी !!!
...

शुक्रवार, 29 जून 2012

जब भी कभी जिन्‍दगी हंसती है ...

बड़ा नज़दीक का रिश्‍ता है
जिन्‍दगी से जिन्‍दगी का
इसके बिना
जिन्‍दगी के अर्थ
समझ ही नहीं आते
व्‍यर्थ लगता है
सबकुछ
...
जिन्‍दगी की आंखों में
आंखे डालकर  जब भी कभी
जिन्‍दगी हंसती है  सपने सजाती है
अपनी उंगलियों से उसका
सर सहलाती है 
समझती है उसके
मौन संवाद को
पढ़ती है उसकी आंखो में प्‍यार को
बेखौफ़ होकर सौंप देती है खुद को वो
उसकी हथेलियों में
फिर चाहे वो कितना भी उछाले
हवा में उसको
उसके चेहरे पर मुस्‍कान होती है
आंखों में झांकता है विश्‍वास
वो उसे संभाल लेगी
...

मंगलवार, 1 मई 2012

बेटी को पराई ...












आपने देखा होगा,
आपने जाना होगा,
दिल ने इजाजत दी हो,
या नहीं,
पर आपने माना होगा ।
रिवाज के नाम पर,
रस्‍मों की दुहाई देते लोग ।
लहू के नाम पर,
रिश्‍तों  की दुहाई देते लोग ।

जन्‍म देने वाली,
होती एक मां
फिर भी बेटे को,
कुल का दीपक,
बेटी को पराई ही,
सदा कहते लोग.... 


थाम के उंगली चलना छोड़ दे ... 

उसे लिखना तो नहीं आता
पर वो अश्‍कों की नमी के बीच
हिचकियों के साये में
अटक - अटक कर बोल रही थी
इन शब्‍दों को
मन द्रवित हो गया ...
माँ
मुझे तुम
खेलने को खिलौना मत दो
पर मेरे मन को
यह मत कहो कि
वह खिलौना देखकर
मचलना छोड़ दे  ...
मेरे मन का बच्‍चा अभी भी
तुम्‍हारे साये में चलता है
उससे ये मत कहो
कि वो तुम्‍हारी
थाम के उंगली चलना छोड़ दे ...!!!