शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मां आओ न ...














उसे जब भी
मेरे आंचल में छुपना होता
कहती मां
देखो धूप कितनी तेज है
और मेरे आंचल में
आकर छुप जाती ....
उसकी इस
शैतानी पर मैं
सिर्फ मुस्‍करा के रह जाती ...
उसे जब भी
कुछ खाना होता
बड़े प्‍यार से मेरे पास आती
मां आज तुमने
पानी भी नहीं पिया
तुम्‍हें भूख नहीं लगती
मुझे तो
बहुत जोर की भूख लगी है
थोड़ा खाने को दो न ...
हर समय
वह कोई न कोई
धमाल करती ही रहती
कभी दीदी का
दुपट्टा लेकर आ जाती
मां मुझे
भी साड़ी पहनाओ न ...
जब भी मैं
उसे पढ़ने को कहती तो
वह शुरू हो जाती
वन..थ्री ..सेवन ...टेन ..
बस अब हो गया
पैर पकड़कर शुरू हो जाती
मेरा पैर दुखता है
मां नींद आ रही है
सोने चलो न ....
इसकी शै‍तानियों के आगे
मेरी एक नहीं चलती
जब तक इसकी बात न मानो
सांस नहीं लेती
पुकारती ही रहती
मां आओ न ...मेरी प्‍यारी मां ....

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

तुम बहुत अच्‍छी हो ....








कभी मां गौरेया कहती,

कभी कहती नन्‍हीं चिडिया

कभी कहती शैतान

मां के यह प्‍यारे

सम्‍बोधन सुनकर

मैं रह जाती हैरान

मेरी पलकों के सपने

जाने कब

वह अपनी आंखों में ले लेती

और मुझे सिर्फ

हौसला देती आगे बढने का

अपने पंखों में मुझको छुपा कर

मुझे हर तूफान से बचाती

और मेरे लिये तो

बस सारी दुनिया वही हो जाती

मेरे हर सवाल का जवाब

उसके पास होता था

सिवाय इस के

जब मैं भावुक होकर कहती

तुम बहुत अच्‍छी हो

तो एक मुस्‍कान के साथ कहती

बेटा हर मां

अपने बच्‍चे के लिये

अच्‍छी होती है

और हर बच्‍चा

अपनी मां का प्‍यारा होता है ...

बुरे तो बस हालात हो जाते हैं

जिनके आगे

हम लाचार हो जाते हैं ...।

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

मां सुनती है ...








मैं खामोश रहूं तो

मां सुनती है

मेरी खामोशी को

पहचानने की

कोशिश करती है

हर आहट को

लेकिन मेरे आवाज देने पर

वह खुद छुप जाती है

हंसी को दबाकर

मुस्‍कराती है

यह लुका छिपी का खेल

मेरे साथ

अक्‍सर खेलती है वह

और मैं तो

हर खेल में

मां को

जीतते हुये

देखना चाहती हूं

पर मेरा मन भी कभी

यह चाहता है

मां आवाज देकर मुझको बुलाये

और मैं छुप जाऊं ...............।।


मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

मां तुम ....








मेरी आंखे नींद से

बोझिल होती हैं पर

उनमें नींद नहीं आती

बिन तुम्‍हारे

कोई गीत गुनगुनाए ।

सुबह को बिन तुम्‍हारे

जगाये जागने का

मन नहीं करता

जब तुम

प्‍यार से कहती हो

ऊं साईं राम

बेटा उठ जाओ

मेरी बंद पलकों

में तुम्‍हारी छवि

समा जाती

मां तुम

खामोश मत रहा करो

तुम्‍हारा मौन

मुझे विचलित कर देता है ।

शनिवार, 6 नवंबर 2010

फुलझड़ी की चमक ....


रौशनी करते ही फुलझड़ी की

चमक उठी नन्‍हीं की आंखे भी

उसने भी अपनी छोटी सी हथेली को

फैलाया उसे पकड़ने के लिऐ

रौशनी में उसका उछलना

हर्षित कर गया मन को

दो न ...मुझे भी .. जलाना है ...

हमारा डर ...उसकी खुशी

हमारा रोकना ...उसका पकड़ना

फुलझड़ी को ...उसके पास ले गया ...

पता ही नहीं चला ...

उसके यह शब्‍द

दीवाली में आपके लिए .....।