बुधवार, 20 अप्रैल 2011

मां कैसे जान जाती हैं ....













मां के हाथों में
जादू की छड़ी जैसी
कोई चीज तो नहीं दिखती
पर वे काम सारे जादू से करती हैं
इतनी जल्‍दी कि
हम जब तक समझते हैं कहते हैं
और वो पूरा कर देती हैं ...
मां की आंखों पे
जादू वाला चश्‍मा भी नजर नहीं आता
फिर भी जाने मां को कैसे पता चल जाता है
हमने उनसे क्‍या छिपाया है
हम हैरान परेशान से
भाई-बहन आंखो ही आंखों में सवाल करते हैं
मां कैसे जान जाती हैं इतना कुछ
लगता है मां के पास जादू से भी बड़ा कुछ है
तभी तो वो एक चुटकी में हल कर देती हैं
सारी उलझनें
हम उलझकर रह जाते हैं मां की
इस प्‍यार भरी मुस्‍कान में
और फिर खोजने लगते हैं जादू से बड़ा क्‍या है
इनका प्‍यार ...या जादू ....

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

मां जब भी ...













मां जब भी सज़दे में होती है,
उसकी आंखे नम हो जाती है ।

कहती है मेरे अश्को को जाने दे,
तेरी बलाएं तो कम हो जाती हैं ।
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गुरुवार, 24 मार्च 2011

कड़ी धूप ...
















दर्द सहकर
मुस्‍कराती है
बहते हैं आंसू
जब मां के
बच्‍चों से छिपाती है
कड़ी धूप में
खुद नंगे सिर हो
तो कोई बात नहीं
दामन से अपने
लाल को ढंककर
झुलसने से बचाती है ...।।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

नये रंग में ...!!
















मां हर बार तुम
वही रंग ले आती हो
नीला और पीला
हरा और गुलाबी
इस बार कोई
रंग नया लाओ तो
मुझको रंगना है तुमको
भी उस रंग में .....।
हर बार होली के दिन
तुम रसोई में
पकवानों की खुश्‍बू के बीच
छिप जाती हो
इस बार सारे पकवान
बनने के बाद ही
मैं रंग घोलूंगी
रंगना होगा तुम्‍हें भी
उस नये रंग में ....।
तब तुम्‍हारा कोई बहाना
काम नहीं करेगा
गुलाल का टीका
मेरे गालों पर लगाकर
सटाना तुम्‍हारा वो गाल
मुझे थोड़ी देर के लिये
रोक तो देगा
पर तुम्‍हें रंग तो खेलना होगा
बोलो खेलोगी न मां ...
मेरे साथ
उस नये रंग में ...।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

कोख में पली हूं नौ माह मैं भी तो मां ...












रस्‍म के नाम पर, रिवाज के नाम पर जाने,

कब तक होती रहेगी यूं ही कुर्बान जिंदगी ।

पोछकर अश्‍क अपनी आंख से पूछती जब,

बेटी मां से क्‍यों दी मुझे तूने ऐसी जिंदगी ।

मेरा कोई दोष जो मुझे मिला ये कन्‍या जन्‍म,

क्‍या दर्द, और वेदना बनके रहेगी ये जिंदगी ।

तेरी कोख में पली हूं नौ माह मैं भी तो मां,

आ के धरा में करती हूं मैं तेरी भी बंदगी ।

माना की पराई हूं ‘सदा’ से लोग कहते आये,

पीर मेरी समझ ली बिन कहे तुमने दी जिंदगी ।

तिरस्‍कृत हुई सहा अपमान भी मैने, नहीं छोड़ा,

फिर भी मैने ईश्‍वर इसे जो मिली मुझे जिंदगी ।

दूंगी संदेश जन-जन को मैं, करूंगी सार्थक जीवन को,

अभिशाप नहीं वरदान अब बेटी बचाओ इसकी जिंदगी ।